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जामुन ।करीबन् 25 साल पहले रेलवे में बाढ़ में लाईन बहुत खराब हो गई थी इसलिए मुझे भी गोवर्धन स्टेशन, मथुरा के पास, 17 दिन वेटिंग हाल में रहना पड़ा। काम करना पड़ा।आसपास जंगल में जामुन के कई पेड़ थे। ईलाके में हर गड़रिया एक प्लास्टिक थैली में जामुन लिए घूमता रहता था और खाता रहता था। एक दिन हमारी मेटेरियल ट्रेन मथुरा के बाहर खड़ी हो गई। ड्राईवर जानकार था बोला घंटों लगेंगे , आईये पास के पेड़ की छांव में बैठते हैं। वह पेड़ छोटे मीठे जामुन से लदा था। उसने उसे झझकोरा तो काफी पके जामुन निचे गिरे। मैंने जीवन में पहली बार इतने मीठे और इतने सारे जामुन एक बार में खाये। आज जामुन खाते समय याद आ गई। उस समय मेरा हेडक्वार्टर अजमेर था। गिलहरी और तोते भी थे और भरपेट जामुन खा रहे थे।
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राधेश्याम मेट,नानी चिरई, कच्छ गुजरात, रेलवे। मैंने जाना कि पद और परिस्थिति बदलने से कयी बार व्यक्ति का काम करने का तरीका बदल जाता है। राधेश्याम मेरे अधीन एक गैंगमैन था। रेलवे में। ट्रेक मेनटेनेंस में। उसका काम साधारण था। कीमैन में प्रमोट होने पर कुछ बेहतर हुआ।मेट के पद पर प्रमोट होने पर बहुत ही अच्छा हो गया। चिरई इलाके की मिट्टी कमजोर थी इस कारण रेल लाईन बार बार बैठ जाती थी।इलाके की सारी गैंगों के गैंगमैन बुलाने पड़ते थे ठीक करने के लिए। राधेश्याम ने काफी मेहनत करी और हमारे मिले जुले प्रयास से चिरई वाला इलाका काफी बेहतर हो गया और चिरई की गैंग बाहर दूसरों के इलाके में काम करने जाने लगी। उसने एक हिरन बच्चे के समान पाल रखा था। एक बार वह खो गया। मीलों दूर तक रन में ढूंढा। नहीं मिला। कयी दिनों तक उसने खाना नहीं खाया था। उसके पहले उस इलाके में मेट महावीर था। बहुत अच्छा इंसान और मेहनती ईमानदार,पर लेबर उससे डरती नहीं थी।
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