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झिझक के पल।

“झिझक के पल” के बारे में मुझे अगस्त 1979 में ठीक से पता चला।मैं उस समय भचाऊ ,कच्छ, गुजरात में नौकरी पर था। जुनियर ईन्जीनियर ट्रेक। 11-8-1979 को भचाऊ से करीबन  70 कि.मी.दूर मोरबी में मच्छू बा...

फोटोग्राफी और मैं।

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मोर्निंग वॉक।

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सुबह वॉक पर जाते समय यदि आप के उपर पानी की बौछार पड़े तो मुझे ऐसा लगता है जैसे नये ऐरोप्लेन की पहली (maiden)फ्लाईट पर उसे वाटर सेल्यूट दिया जा रहा हो।

मेरा घर।

घर। एक छत सर पर।चार दिवारें। एक पता-खत के लिए,आधार कार्ड के लिए। बुरे वक्त को गुज़ारने की जगह, बहुत जरुरी है जीवन मैं। घर छोटा हो सकता है,दीवारें बैरंग, फर्श टूटा फूटा,खिडक़ी के काँच क्रेक,दरवाजे कमजोर।पानी सप्लाई कभी हाँ कभी ना।पुरानी टूटी-फूटी खाट।बैठने के लिए सरकंडे की पुरानी मुढिया। रसोई मैं पुराना प्रेशर स्टोव,कुछ पुराने बरतन।राशन के लिए एक टिन कनस्तर,सब चलेगा। पर,इस आश्रय मैं आप अपना बुरा वक्त गुजार सकते हैं।रूखी-सूखी कच्ची-पक्की पकाकर खा सकते हैं।पुरानी लूंगी में बिना गद्दे के चैन की नींद सो सकते हैं। बे वक्त जी भर के रो सकते हैं। अपनी गलतियों की समीक्षा कर सकते हैं। अलयूमिय की पतेली में बनाई,बिना छानी, काली चाय,काँच के गिलास में पी सकते हैं। पारले जी बिसकुट चाय मैं डुबोकर खा सकते हैं। खिचडी पका कर खाकर पेट की भूख मिटा सकते हैं।ढेरों विल्स सिगरेट पी सकते हैं। कागजों पर डूडल्स बना सकते हैं। अपने घर की बात ही कुछ और है,ऐसा यात्रा के बाद लौट कर,हर बार  हम कहते ही हैं। अपने घर मे बैठकर बारिश में गरमा - गरम पकोड़े खाने का मज़ा  ही कुछ और है। दीपावली पर ,अपने घर ...

मेरा घर-भचाऊ,कच्छ, गुजरात।

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भचाऊ में हमारा घर कुछ ऐसा था ।

उसकी कुछ मिनटों की मुलाकात मौत से।

मिट्टी ढ़हना ,दबना फिर बच निकलना व उसकी घबराहट क्या होती है यह नजदीक से देखा था।उस घटनाक्रम में मेरा एक पात्र होना मुझे आज भी याद है। मेहसाना से करीब 50 कि.मी.दूर रेलवे पुल 945.बारि...

गरीब की खुशियों को भी नजर लगती है।

मैंने,गरीब की छोटी -2 खुशीयों को भी नजर लगते, करीब से देखा है।अतीत के उस घटनाक्रम में मैं भी एक पात्र था। करीब 15 साल पुरानी घटना है।अजमेर रेलवे स्टेशन।प्लेटफार्म एक।अहमदाबा...